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Sunday, June 12, 2011

A minute to read. . . .



Read this poem, and
Follow the recommendation at
The end. . .

As I was walking
Down life's highway
Many years ago

I came upon a
Sign that read

Heavens Grocery Store..

When I got a
Little closer

The doors swung
Open wide

And when I came
To myself

I was standing
Inside..

I saw a host of
Angels.

They were
Standing everywhere

One handed me a
Basket

And said 'My
Child shop with care..'

Everything a
Human needed
Was in that
Grocery store

And what you
Could not carry
You could come
Back for more

First I got some
Patience.

Love was in that
Same row.

Further down was
Understanding,
You need that
Everywhere you go..

I got a box or
Two of Wisdom
And Faith a bag
Or two.

And Charity of
Course
I would need some
Of that too..

I couldn't miss
The Holy Ghost
It was all over
The place.

And then some
Strength
And Courage to
Help me run this race.

My basket was
Getting full
But I remembered
I needed Grace,

And then I chose
Salvation for
Salvation was for
Free

I tried to get
Enough of that to do
For you and me..

Then I started to
The counter
To pay my grocery
Bill,

For I thought I
Had everything
To do the Masters
Will.

As I went up the
Aisle
I saw Prayer and
Put that in,

For I knew when I
Stepped outside
I would run into
Sin.

Peace and Joy
Were plentiful,
The last things
On the shelf.

Song and Praise
Were hanging near
So I just helped
Myself.

Then I said to
The angel

'Now how much do
I owe?'

He smiled and
Said

'Just take them
Everywhere you go.'

Again I asked
'Really now,

How much do I
Owe?'

'My child' he
Said, 'God paid your bill
A long long time
Ago.'

This poem has
Been sent to you
With love and for
Blessings.

Sunday, April 10, 2011

सांस चलती है तुझे,चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.



सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.

चल रहा है तारकों का,
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है,
शुन्य में भ्रमता भ्रमाता,
पांव के नीचे पड़ी,
अचला नहीं ये चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी,
एक थल पर टिक न पाता.

शक्तियां गति की तुझे,
सब ओर से घेरे हुए हैं,
स्थान से अपने तुझे,
टलना पड़ेगा ही मुसाफिर,
सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.

थी जहाँ पर गर्त, पैरों,
को जमाना ही पड़ा था,
पत्थरों से पांव के,
छाले छिलाना ही पड़ा था,
घास मखमल सी जहाँ थी,
मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर,
तन जुड़ाना ही पड़ा था.

पग परीक्षा, पग प्रलोभन,
जोर कमजोरी भरा तू,
इस तरफ दतना, उधर,
ढलना पड़ेगा ही मुसाफिर,
सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चन्द्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी,
तारिकाओं को जगाना,
एक झोंके ने बुझाया,
हाथ का भी दीप लेकिन,
मत बना इसको पथिक तू,
बैठ जाने का बहाना.

एक कोने में ह्रदय के,
आग तेरे जल रही है,
देखने को जग तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर,
सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.





Hai Andheri Raat Par Deepak Jalana Kab Mana Hai


है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिस में वितानों को ताना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रूचि से संवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटा कर इंट, पत्थर, कंकडों, को,
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

बादलों के अश्रू से धोया गया नभनील नीलम,
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम उषा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा,
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिला कर हाथ की दोनों हथेली,
एक निर्मल स्त्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

क्या घडी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आयी,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती,
थी हंसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गयी उल्लास के आधार, माना,
पर अधिरता पर समय की मुस्कुराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

हाय वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हों दुसरे में जो निरंतर,
भर दिया अम्बर अवनि को मत्तता के गीत गा गा,
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

हाय वो साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आये,
पास क्या आये, ह्रदय के बीच ही गोया समाये,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिला कर,
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गए,
वे गए तो सोच कर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

क्या हवाएं थी कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरे शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता जोर किसका,
किन्तु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.


Agnipath


वृक्ष हो भले खड़े,
हो घने, हो बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ.

तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ.

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रू, स्वेद, रक्त से,
लथपथ, लथपथ,लथपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ.



Thursday, March 17, 2011

Purva Chalne Ke Batohi Baat Ki Pehchaan Kar Le


पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की जबानी

अनगिनत राही गए इस राह से उनका पता क्या पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी

यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है खोल इसका अर्थ पंथी पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ यात्रा सरल इससे बनेगी सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना

हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे

किस जगह यात्रा खतम हो जाएगी यह भी अनिश्चित है अनिश्चित कब सुमन कब कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छू जाएँगे मिलेंगे कौन सहसा आ पड़े कुछ भी रुकेगा तू न ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

A Great Poem by Dr. Harivansh Rai ji Bachchan

Wednesday, January 7, 2009

Hazaro ke liye



हजारो के लिए

बनो सहारा बे-सहारों के लिए

बनो किनारा बे-किनारों के लिए

जो जीये अपने लिए तोः क्या जीये

जी सको तोः जियो हजारो के लिए