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Monday, March 26, 2012

नर हो न निराश करो मन को-मैथिलीशरण गुप्त


नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।

संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।........मैथिलीशरण गुप्त 

Thursday, December 15, 2011

उठो धरा के अमर सपूतो



उठो धरा के अमर सपूतो
पुनः नया निर्माण करो ।
जन-जन के जीवन में फिर से
नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो ।


नया प्रात है, नई बात है,
नई किरण है, ज्योति नई ।
नई उमंगें, नई तरंगे,
नई आस है, साँस नई ।
युग-युग के मुरझे सुमनों में,
नई-नई मुसकान भरो ।


डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ
नए स्वरों में गाते हैं ।
गुन-गुन-गुन-गुन करते भौंरे
मस्त हुए मँडराते हैं ।
नवयुग की नूतन वीणा में
नया राग, नवगान भरो ।


कली-कली खिल रही इधर
वह फूल-फूल मुस्काया है ।
धरती माँ की आज हो रही
नई सुनहरी काया है ।
नूतन मंगलमयी ध्वनियों से
गुंजित जग-उद्यान करो ।


सरस्वती का पावन मंदिर
यह संपत्ति तुम्हारी है ।
तुम में से हर बालक इसका
रक्षक और पुजारी है ।
शत-शत दीपक जला ज्ञान के
नवयुग का आह्वान करो ।


उठो धरा के अमर सपूतो,
पुनः नया निर्माण करो ।
-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

Sunday, April 10, 2011

सांस चलती है तुझे,चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.



सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.

चल रहा है तारकों का,
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है,
शुन्य में भ्रमता भ्रमाता,
पांव के नीचे पड़ी,
अचला नहीं ये चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी,
एक थल पर टिक न पाता.

शक्तियां गति की तुझे,
सब ओर से घेरे हुए हैं,
स्थान से अपने तुझे,
टलना पड़ेगा ही मुसाफिर,
सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.

थी जहाँ पर गर्त, पैरों,
को जमाना ही पड़ा था,
पत्थरों से पांव के,
छाले छिलाना ही पड़ा था,
घास मखमल सी जहाँ थी,
मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर,
तन जुड़ाना ही पड़ा था.

पग परीक्षा, पग प्रलोभन,
जोर कमजोरी भरा तू,
इस तरफ दतना, उधर,
ढलना पड़ेगा ही मुसाफिर,
सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चन्द्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी,
तारिकाओं को जगाना,
एक झोंके ने बुझाया,
हाथ का भी दीप लेकिन,
मत बना इसको पथिक तू,
बैठ जाने का बहाना.

एक कोने में ह्रदय के,
आग तेरे जल रही है,
देखने को जग तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर,
सांस चलती है तुझे,
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर.





Hai Andheri Raat Par Deepak Jalana Kab Mana Hai


है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिस में वितानों को ताना था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रूचि से संवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,
ढह गया वह तो जुटा कर इंट, पत्थर, कंकडों, को,
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

बादलों के अश्रू से धोया गया नभनील नीलम,
का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम उषा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा,
थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,
वह अगर टूटा मिला कर हाथ की दोनों हथेली,
एक निर्मल स्त्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

क्या घडी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आयी,
कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई,
आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती,
थी हंसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,
वह गई तो ले गयी उल्लास के आधार, माना,
पर अधिरता पर समय की मुस्कुराना कब मना है
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

हाय वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,
एक अंतर से ध्वनित हों दुसरे में जो निरंतर,
भर दिया अम्बर अवनि को मत्तता के गीत गा गा,
अंत उनका हो गया तो मन बहलने के लिए ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

हाय वो साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आये,
पास क्या आये, ह्रदय के बीच ही गोया समाये,
दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिला कर,
एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गए,
वे गए तो सोच कर यह लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.

क्या हवाएं थी कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरे शोर करना, गुल मचाना,
नाश की उन शक्तियों के साथ चलता जोर किसका,
किन्तु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,
जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,
पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है,
है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है.


Agnipath


वृक्ष हो भले खड़े,
हो घने, हो बड़े,
एक पत्र छांह भी,
मांग मत, मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ.

तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ.

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रू, स्वेद, रक्त से,
लथपथ, लथपथ,लथपथ,
अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ.



Thursday, March 17, 2011

Purva Chalne Ke Batohi Baat Ki Pehchaan Kar Le


पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की जबानी

अनगिनत राही गए इस राह से उनका पता क्या पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी

यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है खोल इसका अर्थ पंथी पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ यात्रा सरल इससे बनेगी सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना

हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे

किस जगह यात्रा खतम हो जाएगी यह भी अनिश्चित है अनिश्चित कब सुमन कब कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छू जाएँगे मिलेंगे कौन सहसा आ पड़े कुछ भी रुकेगा तू न ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

A Great Poem by Dr. Harivansh Rai ji Bachchan

ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?



ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

UTHI AISI GHATA NABH MEIN,
CHHIPE SAB CHAND AUR TAARE,
UTHA TOOFAN WAH NABH MEIN,
GAYE BUJH DEEP BHI SAARE

MAGAR IS RAAT MEIN BHI LAU LAGAYE KAUN BAITHA HAI?
ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

GAGAN MEIN GARV SE UTH UTH
GAGAN MEIN GARV SE GHIR GHIR,
GARAJ KEHTI GHATAYE HAIN
NAHIN HOGA UJALA PHIR,

MAGAR CHIR JYOTI MEIN NISHTHA JAMAYE KAUN BAITHA HAI?
ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

TIMIR KE RAJYA KA AISA
KATHIN ANTAK CHHAYA HAI,
UTHA JO SHEESH SAKTE THE
UNHONE SIR JHUKAYA HAI,

MAGAR VIDROH KI JWALA JALAYE KAUN BAITHA HAI?
ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

PRALAY KA SAB SAMA BANDHE
PRALAY KI RAAT HAI CHAYEE,
VINASHAK SHAKTIYO KI IS
TIMIR KE BEECH BAN AAYEE,

MAGAR NIRMAAN MEIN ASHA DRIDHAY KAUN BAITHA HAI?
ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

PRABHANJAK MEGH DAMINI NE
NA KYA TODA, NA KYA PHODA,
DHARA KE AUR NABH KE BEECH
KUCHH SABUT NAHIN CHHODA,

MAGAR VISHWAS KO APNE BACHAYE KAUN BAITHA HAI?
ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

PRALAY KI RAAT KO SOCHE
PRANAY KI BAAT KYA KOI,
MAGAR PREM BANDHAN MEIN
SAMAJH KISNE NAHIN KHOI,

KISI KE PANTH MEIN PALKE BICHAYE KAUN BAITHA HAI?
ANDHERI RAAT MEIN DEEPAK JALAYE KAUN BAITHA HAI?

HARIVANSH RAI BACHCHAN JI KI KALAM SE EK INSPIRATIONAL POEM
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अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चाँद और तारे,
उठा तूफ़ान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे

मगर इस रात में भी लौ लगाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

गगन में गर्व से उठ उठ
गगन में गर्व से घिर घिर,
गरज कहती घटाए हैं
नहीं होगा उजाला फिर

मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

तिमिर के राज्य का ऐसा
कठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे
उन्होंने सिर झुकाया है

मगर विद्रोह की ज्वाला जलाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रलय का सब समां बांधे
प्रलय की रात है छाई
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आयी

मगर निर्माण में आशा दृढआये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रभंजक मेघ दामिनी ने
न क्या तोडा न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच
कुछ साबुत नहीं छोड़ा

मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रलय की रात को सोचे
प्रणय की बात क्या कोई
मगर प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोई

किसी के पंथ में पलकें बिछाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

श्री हरिवंश राय बच्चन जी की कलम से एक कविता




Wednesday, January 7, 2009

Hazaro ke liye



हजारो के लिए

बनो सहारा बे-सहारों के लिए

बनो किनारा बे-किनारों के लिए

जो जीये अपने लिए तोः क्या जीये

जी सको तोः जियो हजारो के लिए